लोकतंत्र की विडंबना

पश्च‌िम बंगाल में त्रिस्तरीय पंचायतों के लिए आगामी 14 मई को मतदान होना है, पर उससे पहले ही 34.2 फीसदी सीटों पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार निर्विरोध चुन ल‌िए गए हैं! इसल‌िए कुल 58,692 सीटों में से 20,076 सीटों पर चुनाव नहीं होंगे। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि तृणमूल ने इन सीटों पर विपक्ष के किसी नेता को नामांकन पत्र भरने ही नहीं दिया। पंचायत चुनावों की घोषणा के बाद से ही विपक्ष के प्रत्याश‌ियों पर सुनियोज‌ित ढंग से हमले किए गए। पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा आतंक पैदा करने की इस प्रवृत्त‌ि की निंदा की है। माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी का कहना है क‌ि तृणमूल पश्च‌िम बंगाल में लोकतंत्र की हत्या कर रही है। इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन सूबे में इसकी शुरुआत तो वाम मोर्चे ने ही की थी। एक अध्ययन बताता है कि वहां 1978 से अब तक हुए पंचायत चुनावों में ऐसी सीटों की संख्या लगातार बढ़ी है, जिन पर एक से अध‌िक प्रत्याशी न होने के कारण चुनाव नहीं लड़ा गया। 1978 में ऐसी सीटें 0.73 फीसदी थीं, जो 2018 में बढ़कर 34.2 फीसदी हो गई। वर्ष 2003 में वाम मोर्चे के आतंक के कारण 11 प्रत‌िशत सीटों पर विपक्ष अपने उम्मीदवार खड़े नहीं कर पाया था। ममता बनर्जी की पार्टी राजनीतिक हिंसा की उस अपसंस्कृत‌ि को और निचले स्तर पर ले गई है। पंचायत प्रणाली शासन के विकेंद्रीकरण के कारण महत्वपूर्ण मानी जाती है, पर यह लोकतंत्र की विडंबना ही है कि विपक्ष को आतंकित कर सत्ता में अपनी पैठ बनाई जाए! यह 'उपलब्ध‌ि' ममता बनर्जी को गौरवान्व‌ित करेगी या शर्मसार? पश्च‌िम बंगाल में वाम मोर्चे के लंबे शासन की वजह ग्रामीण इलाकों में उसकी मजबूत पकड़ थी। साफ है कि तृणमूल ने उसी तर्ज पर ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाई है। अगर आंकड़े देखें, तो पता चलेगा क‌ि विपक्ष को आतंक‌ित करने में तृणमूल दक्ष‌िण बंगाल में सर्वाध‌िक सफल हुई है, जो उसका मजबूत गढ़ है। वीरभूम में तो 90 फीसदी सीटों पर विपक्ष उम्मीदवार खड़े नहीं कर पाया। स्पष्ट है कि जिस परिवर्तन के नारे के साथ ममता बनर्जी ने पश्च‌िम बंगाल में सत्ता हासिल की, वह खोखला नारा ही है। असली पर‌िवर्तन तो तब होगा, जब राज्य में पिछले पचास साल से व्याप्त राजनीतिक हिंसा पर लगाम लगाया जाएगा। 

Other details:

Related Articles:

  • Share: