इस सौदे का मतलब

फ्लिपकार्ट से सौदे के एलान के बाद वालमार्ट के सीईओ ने भारतीय हितों का खयाल रखने का आश्वासन जरूर दिया है, लेकिन खुदरा व्यापारियों और किसानों की ओर से जो आशंकाएं जताई जा रही हैं, उन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता।

खुदरा क्षेत्र की दिग्गज अमेरिकी कंपनी वालमार्ट ने कई महीनों की चर्चा के बाद आखिरकार भारतीय ऑनलाइन कंपनी फ्लिपकार्ट की 77 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने का एलान किया है, जिससे भारतीय ऑनलाइन बाजार की पूरी तस्वीर बदल सकती है। यह सौदा 16 अरब डॉलर यानी करीब एक लाख करोड़ रुपये में हुआ है, जिससे वालमार्ट को भारतीय ऑनलाइन बाजार में उतरने की छूट मिल जाएगी, जहां एक अन्य अमेरिकी दिग्गज अमेजन पहले से मौजूद है।

वास्तव में यह सौदा देश में इस वर्ष का अब तक का सबसे बड़ा अधिग्रहण है और दिखाता है कि भारतीय ऑनलाइन बाजार किस तेजी से आगे बढ़ रहा है। केंद्र सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अधीन काम करने वाले इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन की रिपोर्ट बताती है कि देश का मौजूदा 2.6 लाख करोड़ रुपये का ई-कॉमर्स बाजार आने वाले एक दशक में 13.4 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा।

दरअसल इसके पीछे भी सबसे बड़ी वजह है इंटरनेट और मोबाइल फोन का विस्तार और जैसा कि आंकड़े बताते हैं कि 2021 तक देश में करीब 83 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता हो जाएंगे! जबकि एक दशक पहले जब सचिन बंसल और बिन्नी बंसल ने फ्लिपकार्ट की शुरुआत की थी, तब वह 2 जी का दौर था और यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि इतनी जल्दी वे ऑनलाइन बाजार की दशा और दिशा बदल देंगे। इसके बावजूद यह सच्चाई है कि भारतीय स्टार्ट अप अभी उस स्थिति में नहीं पहुंच सके हैं, ताकि वे अपने बूते अमेजन या अलीबाबा जैसी विदेशी कंपनियों को चुनौती दे सकें।

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वालमार्ट को 2013 में भारती इंटरप्राइजेज के साथ करार को तब तोड़ना पड़ा था, जब उस पर पिछले दरवाजे से मल्टीब्रांड खुदरा बाजार में घुसने के आरोप लगे थे। वालमार्ट के सीईओ ने भारतीय हितों का खयाल रखने का आश्वासन जरूर दिया है, लेकिन इस सौदे का विरोध यदि खुदरा व्यापारी संघ और स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठन कर रहे हैं, तो उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता।

छोटे व्यापारियों की यह चिंता वाजिब है कि ऑनलाइन कंपनियां उत्पादों पर मनमाने ढंग से छूट देती हैं, जिनसे उनके लिए कारोबार करना मुश्किल होता जा रहा है; यही हाल किसानों का है, जिन्हें उनके उत्पाद के वाजिब दाम नहीं मिलते। जाहिर है, सरकार को समय रहते उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए।  

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