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युवाओं को फेक न्यूज की पहचान करना सीखना होगा। उन्हे सूचना के और बेहतर स्रोतों की तलाश करनी होगी।
प्राचीन रोम से विक्टोरियन काल तक, एक तार्किक और वक्रपटुता का अभ्यास युवाओं को झूठे और संदेहास्पद तथ्यों की पहचान कराने के लिए किया कराया जाता रहा है। समय बदला परन्तु इटली इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि उनके युवा, अपने पूर्वजों की तरह ही, 2017 के इस नये फोरम के लिए तैयार हो जाएं, जो कि है सोशल मीडिया। अक्टूबर के अंत तक, इटली के 8000 स्कूल अपने विद्यार्थियों को पत्रकारों और टेक्नोलॉजी के पुरोधा गूगल और फेसबुक की सहायता से, फेक न्यूज (झूठी ख़बर) को पहचानना सिखाऐंगे। इज़्राइल में, हईफा विश्वविद्यालय एक कोर्स शुरू करने जा रहा है जिसका नाम है, 'फेक न्यूज'। इन कोर्सों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक वाद विवाद, खासतौर पर चुनाव प्रचार के समय, निहित स्वार्थ द्वारा तोड़ मरोड़ न दिया जाए। अमेरिका में 2016 के राष्ट्रपति चुनावों के बाद से, पश्चिम में सार्वजनिक बहस पर रूस की परछांई और उसके ऑनलाइन प्रोपोगेंडा के बादल छाए हुए हैं। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी, छेड़छाड़ की हुई तस्वीरें और सफेद झूठ, बड़े धड़ल्ले से न्यूज वेबसाइट्स पर दिखा दिये जाते हैं। ऑनलाइन इन खबरों को प्रसारित होने में इतन‍ा कम समय लगता है कि जब तक यह पता चलता है कि ख़बर झूठी थी, तब तक वह काफी नुकसान कर चुकी होती है। ‌कल के वोटरों को निश्चित रूप से तथ्यों की पड़ताल कर मनगढ़ंत खबरों से बचने की कला सीखनी होगी। हालांकि, फेक न्यूज लोगों को अपना मत तय करने में सोशल मीडिया की भूमिका से कहीं दूर ही ले जाती है। पारंपरिक या पुराने मीडिया में संतुलन एक अहम चीज थी। उदाहरण के तौर पर, एक अख़बार में सभी सेक्‍शन होते हैं जैसे कि पॉलिटिक्स, क्राइम, स्पोर्ट्स, आर्ट्स आदि। ऐसे में, पत्रकारिता के आदर्शों के चलते, किसी भी खबर के दोनो पक्षों को सामने लाने का प्रयास किया जाता है। सोशल मीडिया पर, यूसर ही संपादक होता है। एल्गॉरिथ्म यह सुनिश्चित करता है कि लोगों को वह दिखे जिसे अधिक से अधिक लोगों ने 'लाइक' किया है, यह अफवाहों को वस्तुनिष्ठता की कसौटी पर कसने के बजाय उन्हें और मजबूती प्रदान करता है। फेक न्यूज निश्चित रूप से ऑनलाइन प्रोपेगेंडा का एक महत्वपूर्ण पहलू है। परन्तु युवाओं को उनकी राय तय करने के लिए उससे ज्यादा का प्रयास करना होगा, जो उन्हे आसानी से प्राप्त हो जाता है।   अंग्रेजी में संपादकीय पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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