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‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ संपादकीय (एडिटोरियल)

01 नवम्बर 2017


संयम है जरूरी


जब तक संवैधानिक बेंच का फैसला नहीं आता, तब तक सरकार को आधार स्कीम को लेकर अपनी उत्सुकता पर संयम रखना होगा।


पिछले सप्ताह, उच्चतम न्यायालय ने सरकार से सवाल किया कि क्या वह नागरिकों को उनके मोबाइल और बैंक खाते, आधार से जोड़ने के लिए दबाव दे रही है? इस सीधे से सवाल का अटॉर्नी जनरल द्वारा दिया गया जबाव संतोषजनक नहीं था। “इसमें कोई ज़बरदस्ती नहीं होगी”, के.के.वेणुगोपाल ने अदालत को बताया। परंतु उन्होनें कोई भी ऐसा लिखित दस्तावेज देने से मना कर दिया जो ऐसे लोगों के खिलाफ दंड का प्रावधान बनाऐ, जो 31 दिसम्बर तक इन दो सेवाओं को आधार से जोड़ने के लिए दबाव बना रहे हैं। सरकार के गोल-मोल रवैये ने सर्वोच्च न्यायालय को मजबूर कर दिया कि वह एक 5 सदस्यीय संवैधानिक बेंच का गठन करे, जो आधार की अनिवार्यता की जांच कर सके। सोमवार को, एक तीन जजों की बेंच ने, जिसके प्रमुख जस्टिस दीपक मिश्रा हैं, कहा कि संवैधानिक बेंच अपनी सुनवाई नवम्बर के अन्तिम सप्ताह में शुरू करेगी। ज‌ब तक बेंच अपना फैसला नहीं सुनाती, तब तक सरकार को आधार को मोबाइल नंबर और बैंक खातों से जोड़ने की अनिवार्यता को स्‍थगित कर देना चाहिए।

आधार के खिलाफ चल रहे मुकदमे पर सरकार का रवैया प्रतिकूल प्रभार डाल रहा है। 2015 में, एक संवैधानिक बेंच ने फैसला सुनाया था कि, “आधार कार्ड पूरी तर‌ह से स्वैच्छिक होगा।” फैसले में यह भी जोड़ा गया था कि स्कीम तब तक स्वैच्छिक रहेगी, जब तक कोई बड़ी बेंच यह निर्णय नहीं लेती कि आधार भारतीयों की निजता का हनन करता है या नहीं। अदालती कार्यवाही और स्कीम की स्पष्ट रूप से विवादास्पद प्रकृति के चलते, सरकार को इस मामले में संयम बरतना चाहिये। लेकिन सरकार सुनवाई के फैसले के बाद से स्कीम को लागू करने के लिए और आक्रामक हो गई है। राज्य सभा में अपने सदस्यों की कम संख्या के कारण सरकार ने घबराकर आधार बिल को पिछले वर्ष मार्च में, लोकसभा में एक धन विधेयक के रूप में प्रस्तुत कर दिया। ऐसा करने में सरकार ने न केवल विपक्ष के साथ मिलकर एक अधिकार, उत्तरदायित्व और राज्य की शक्ति को ध्यान में रखते हुए आधार पर एक तार्किक फैसला लेने का मौका खो दिया, बल्कि निजता पर बढ़ रहे खतरे और व्यक्तिगत डाटा के गलत प्रयोग की ओर सभी का ध्यान आकर्षित कर दिया। संसद के आधार एक्ट पारित करने के छः माह के भीतर ही बैंकों को खाताधारकों का आधार नंबर उनके खातों से जोड़ने के निर्देश थमा दिये गये। मार्च में, दूरसंचार विभाग ने सभी मोबाइल सर्विस प्रदाता कंपनियों को उनके उपभोक्ताओं के आधार नंबर की मदद से उनकी जानकारियां और बायोमैट्रिक डीटेल जमा करने के आदेश दे दिये।

जुलाई और अगस्त में आधार पर उच्चतम न्यायालय की सुनवाई में, वेणुगोपाल, साथ ही साथ उनके पूर्ववर्ती मुकुल रोहातगी ने दलील पेश की, कि निजता एक मौलिक अधिकार नहीं है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अगस्त में निजता के मामले की सुनवाई ने इन विवाद में फिर से जान डाल दी है। सरकार को अब न्यायालय को यह विश्वास दिलाना होगा कि जरूरी सेवाएं पाने के लिए आधार की अनिवार्यता, निजता के युक्तियुक्त निर्बन्‍धनों के आधीन है। इस प्रश्न का उत्‍तर जरूर मिलना चाहिये कि किसी व्यक्ति की बायोमेट्रिक जानकारी किसी निजी क्षेत्र की कंपनी, जैसे कि किसी मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर को देना, उस व्यक्ति की निजता का हनन है या नहीं? सोमवार को न्यायालय द्वारा गठित की गई पांच जजों की बेंच इन मामलों पर अपने फैसले सुनाऐगी। तब तक, सरकार को आधार के मामले में सावधानीपूवर्क आगे बढ़ना चाहिये।

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