‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ संपादकीय (एडिटोरियल)

16 नवम्बर 2017


तय मानकों पर हो पर्यावरण की समीक्षा


ग्रीन कोर्ट के हस्तक्षेप ऑड-इवन ‌के जरिये वर्तमान प्रदूषण आपात को नियंत्रित करने को लेकर इस नीति को लागू करने की संभावना पर विराम चिन्ह लगा दिया है।


पिछले हफ्ते नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाई, जब दिल्ली सरकार ने सड़कों पर अजीबो-गरीब तरीके से ऑड-इवन लागू करने का फैसला किया। ट्रिब्यूनल ने दबाव बनाया कि केवल कानून के जरिये ही नहीं, जो कि करना अनिवार्य है, बल्कि नीति पर होना जरूरी है, इसलिए सबसे अच्छा तरीका कार्यपालिका पर छोड़ देना है। यह पाया गया कि दिल्ली सरकार की योजना जारी प्रदूषण आपात का सामना करने में कसौटी पर खड़े नहीं उतरती।

मंगलवार (14 नवंबर, 2017) को ट्रिब्यूनल ने दिल्ली सरकार द्वारा महिलाओं, सरकारी कर्मचारियों, बच्चों को ढोने वाले वाहनों और मनमाना तौर पर दोप‌हिया वाहनों पर छूट देने का खंडन किया। ग्रीन कोर्ट के हस्तक्षेप ऑड-इवन ‌के जरिये वर्तमान प्रदूषण आपात को नियंत्रित करने को लेकर इस नीति को लागू करने की संभावना पर विराम चिन्ह लगा दिया है। ज‌बकि दिल्ली सरकार का तर्क है कि शहर में सार्वजनिक परिवहन की कमी की वजह से बिना छूट दिए ऑड-इवन लागू करना संभव नहीं है।

न्यायपालिका के दूसरे किसी अंग की तरह ही एनजीटी की विशेषज्ञता, कानून की व्याख्या करना एवं उनके खिलाफ कार्यपालिका की कार्रवाई की समीक्षा करना है। पिछले हफ्ते, जब से दिल्ली सरकार ने सड़कों पर ट्रैफिक कम करने के लिए ऑड-इवन योजना को लागू करने की घोषण की है, उसे राष्ट्रीय हरित अधिकरण से लगातार फटकार मिल रही है। ट्रिब्यूनल ने केवल कानून के मसले पर ही बोला है, जिसे कि लागू किया जाना निश्चित था, बल्कि नीतियों पर भी बोला है। उसने पाया कि दिल्ली सरकार की योजना इतनी लचर थी कि वह दिल्ली में मौजूदा प्रदूषण आपात का प्रभावी रूप से सामना नहीं कर सकती थी।

ट्रिब्यूनल की स्‍थापना “पर्यावरण संबंधी किसी वैधानिक अधिकार को लागू करने के साथ ही पर्यावरण सुरक्षा और वन संरक्षण से जुड़े मामलों के प्रभावी और त्वरित निस्तारण” के लिए की गई थी। लेकिन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल अधिनियम, 2010 में निहित नीति निर्माताओं के निर्देशों में, ग्रीन कोर्ट ने प्रायः इस जनादेश को बढ़ाया है। पिछले साल जब दिल्ली दूसरे प्रदूषण आपात से जूझ रही थी तब एनजीटी ने आदेश दिया था कि दीर्घकालिक और अल्पकालिक आधार पर ऐसे कदम उठाए जाएं जिसमें ध्यान रखा जाए कि वर्ष 2017 में प्रदूषित वातावरण का बुरा प्रभाव और खतरनाक असर फिर से दिखाई न पड़े।

ऐसे कई संक्षिप्त दिशा-निर्देशों का अनदेखा किया गया। न्यायालय की अपनी स्वीकारोक्ति के मुताबिक ऐसे आदेश जो कि राजधानी में निर्माण कार्य और डीजल जनरेटर के इस्तेमाल से संबंधित थे, क्रियान्वित नहीं किए गए। यह देखा गया कि निर्णयों का अनुपालन केवल दोषपूर्ण तरीके से हुआ। हरित अधिकरण ऐसी गलतियों के लिए केवल राज्य सरकार को दोषी ठहराती है। उदाहरण के तौर पर पिछले हफ्ते इसने पंजाब एवं हरियाणा सरकार को कम से कम तीन मौकों पर इस बात को लेकर चेताया था कि राज्यों में पराली जलाने को लेकर 2015 के निर्देशों को लागू करने में विफल रही।
एनजीटी को यह स्वीकार करने की जरूरत है कि ये असफलताएं यह इंगित करती हैं कि हरित निकाय केवल उन क्षेत्रों में ही दखल दे रही है जहां पर उसे थोड़ी विशेषज्ञता हासिल है, जो कि इसकी विश्व‌सनीयता को भी कम कर रही है। इससे किस को कुछ भी लेना देना नहीं है कि दिल्ली सरकार का ऑड-इवन नीति दोष रहित है। वास्तव में, दिल्ली के प्रदूषण संकट को पर्यावरण से जुड़े सभी अधिकारियों को मंथन के अवसर के रूप में देखना चाहिए।

एनजीटी को उन मामलों को फिर से देखना चाहिए जहां पर उसने अपनी सीमा को पार किया है जो न्यायिक हस्तक्षेप को नीति निर्माण से अलग करती है।

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