‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ एडिटोरियल 12 अगस्त, 2017

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कहो मत, सुनो



पूर्व उपराष्ट्रपति के प्रति अपने तीखे शब्द व्यक्त करके बीजेपी ने अंसारी को नहीं बल्कि खुद को कटघरे में खड़ा कर दिया है।


अपने विदाई भाषण में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एस. राधाकृष्‍णन के शब्द याद दिलाए, “अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सुरक्षा ही लोकतंत्र की सही पहचान है। लोकतंत्र तब उत्पीड़न का रूप ले लेता है जब वह विपक्ष को खुलकर, आजादी से और निडर होकर आलोचना करने से रोकता है। परंतु इसी के साथ अल्पसंख्यकों की भी अपनी जिम्मेदारियां हैं।” यह बहुत ही अच्छे शब्द थे जिन पर किसी भी लोकतंत्र में गौर किया जाना चाहिए था। परंतु भारत की सत्ताधारी पार्टी ने ऐसा नहीं किया। उनके अपना ऑफिस छोड़ते ही भाजपा ने अंसारी के उस संदेश की खाल उधेड़नी शुरू कर दी, जो उन्होंने अपने विदाई के समय और अन्य जगहों पर दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व उपराष्ट्रपति के काम के बारे में कहा कि वे पश्चिमी एशिया में डिप्लोमैट रह चुके हैं तथा उनके परिवार का भी कांग्रेस और खिलाफ़त आंदोलन से गहरा ताल्लुक रहा है, उन्होंने अल्पसंख्यक आयोग तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ‌वक्त बिताया है। अपनी इन बातों से वह अंसारी के विचारों पर एक लेबल लगाना चाह रहे थे। प्रधानमंत्री के अनुसार, अंसारी ने अपने जीवन का एक लंबा समय उस छोटे से दायरे के भीतर ही गुजारा है तथा अब वह विचारों के अनुसार काम करने के लिए, सोचने के लिए तथा कहने के लिए स्वतंत्र थे। प्रधानमंत्री के अतिरिक्त अन्य लोगों के विचार अधिक कठोर थे। नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति एम. वेंकया नायडू ने इस बात का सिरे से खंडन कर दिया कि अल्पसंख्यक असुरक्षा महसूस कर रहे हैं या असहिष्‍णुता बढ़ रही है। उन्होंने अंसारी के विचारों को राजनैतिक प्रचार ठहरा दिया। बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि अंसारी के विचार ने देश की छवि को चोट पहुंचाई है तथा शायद इसके पीछे उनका कोई मकसद रहा हो।
उनपर धावा बोलने के बजाय बीजेपी को अंसारी की बात सुननी चाहिए थी। उनके विचारों के प्रति असम्मान और असंतोष जताकर बीजेपी ने खुद को अक्‍ख़ड़ और अशिष्ट साबित कर दिया। इससे बीजेपी पर लगातार होने वाले एक दोषारोपण की पुष्टि भी होती है, कि सत्ता में आने के तीन वर्ष के भीतर एक पार्टी के तौर पर लगातार जीत दर्ज करने और अपने सभी एजेंडों को एक प्रखर तरीके से प्रस्तुत करने के बावजूद पार्टी विरोधी विचारधाराओं और मतों के प्रति असहिष्‍णु है। इसका सबसे प्रबल उदाहरण तब तब देखा जा सकता है जब जब देश में अल्पसंख्यकों के ‌प्रति बढ़ती असहिष्‍णुता की बात उठती है, चाहे वह कट्टर देशभक्ति के रूप में नज़र आये या फिर गाय के नाम पर हिंसा के रूप में। सत्ताधारी पार्टी के रूप में, बीजेपी यह संदेश प्रसारित करने में असफल रही है कि वह अल्पसंख्यकों को भी समान अधिकार दिलाने और उनके हितों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है, साथ ही वह एक स्वस्‍थ और सुरक्षित वाद-विवाद का स्वागत करता है। अपने तीखे शब्द व्यक्त करके बीजेपी ने अंसारी को ही नहीं बल्कि खुद को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।

 

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