‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ संपादकीय (एडिटोरियल) 07 सितम्बर, 2017

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शरणार्थी, तुम्हारा स्वागत है


रोहिंग्या मसले पर भारत सताए हुओं के प्रति अपनी करूणा और आतिथ्य की वृत्ति के अनुपालन में नाकाम हो रहा है


वॉर् श्काफ्न दास यानी कि हम यह कर सकते हैं। इन तीन शब्दों के साथ जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने 2015 में अपने देश का दरवाजा सीरियाई शरणार्थियों के लिए उस समय खोला दिया था, जब कोई भी देश उन्हें स्वीकार नहीं कर रहा था। इससे विश्व पटल पर नाटकीय रूप से जर्मनी की प्रतिष्ठा और रूतबे में बढ़ोतरी हुई। यह दुखद है कि भारत, इस मामले में अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की ऐतिहासिकता का बखान करता रहता है, लेकिन उसने मर्केल के नक्शे कदम पर चलने का निर्णय नहीं लिया। सन 1951 में शरणार्थियों के हालातों पर हुए संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में या 1967 में हुए इसके मसविदा, जो किसी क्षेत्र विशेष में आश्रय की तलाश करने वाले लोगों के लिए एक मेजबान देश के दायित्वों की निर्भरता पर आश्रित है, पर भारत ने हस्ताक्षर नहीं किया था। इसलिए, भारत ने रोहिंग्या लोगों को अपने प्रक्षेत्र में प्रश्रय न देकर किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं किया है। न ही इसका शरणार्थियों के लिए कोई अपना घरेलू कानून ही है। लेकिन, भारत एक महाशक्ति बनने की संभावनाएं रखता है, और उसके लिए यह जरूरी है कि वह उस जैसा ही व्यवहार करे।

रोहिंग्या की आबादी करीब 10 लाख है और ये दुनिया की सबसे बड़ी सताई हुई मुस्लिम कौम है। हालांकि, रोहिंग्याओं म्यांमार के राखिन प्रांत में रहते आ रहे हैं, जहां उनको नागरिकता से वंचित रखने और उनके लिए आर्थिक अवसरों को सीमित करने के लिए उनकी स्वतंत्रता को प्रतिबंधित किया गया है। पिछले साल से म्यांमार सेना पर अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी कहलाने वाले एक समूह द्वारा लगातार आकस्मिक और चौंकाने वाले हमले हो रहे हैं जो कि रोहिंग्याओं को व्यापक तौर से तबाह होने से बचाने की एक पहल है। पिछले तीन हफ्तों से, हजारों की संख्या में रोहिंग्या राखिन से भागे और सीमा पार कर बांग्लादेश में शरण ले चुके हैं। ऐसे समय में, गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू का यह बयान कि “देश में पहले से ही रह रहे रोहिंग्याओं को वापस भेजने के लिए सरकार योजना बना रही है,” भारत और भारतीयों को देश में सताए हुए शरणार्थियों के लिए करूणा के साथ एक सुरक्षित आश्रय उपलब्ध करने के कर्तव्य के बजाय ओछी मानसिकता और असुरक्षित दशा को दर्शाता है।

रिजिजू ने आलोचकों का मुंह यह याद दिलाते हुए बंद किया है कि भारत को करूणा या दया के सबक को सीखने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह पहले भी सैकड़ों शरणार्थियों को शरण दे चुका है। लेकिन लगता है कि उन्होंने इससे खुद कोई सबक नहीं सीखा है, जब स्वतंत्र भारत ने तिब्बतियों, पूर्वी पाकिस्तानियों और श्रीलंका के शरणार्थियों को शरण दिया तो कुछ शुरुआती निराशाओं के बाद भी देश के रूप में भारत की आस्था मजबूत हुई और दुनिया में इसने एक अहम स्थान बनाया। सच्चाई तो यह है कि भाजपा शासित भारत केवल हिंदू शरणार्थियों, जो कहीं भी सताई हुई अल्पसंख्यक कौम हो, का स्वागत करने को तैयार है। मुस्लिम होने के नाते रोहिंग्या इस अर्हता को पूरा नहीं करते हैं। हो सकता है कि रोहिंग्या कट्टरपंथी हों, और कहा जाता है कि एआरएसए का संबंध लश्कर-ए-तैयबा के साथ है। लेकिन दुर्दशा से उबारने का काम खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा तंत्र का है जिससे कि पूरी कौम पर बदनुमा धब्बा न लगे। यदि भारत सच में इस आव्रजन को लेकर चिंतित है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी म्यांमार यात्रा के दौरान यह कहना चाहिए था कि रोहिंग्याओं को वहां से निकाला न जाए।

 

 

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